Saturday, June 3, 2017

तो क्या ठहरूं


शहर हसीं है, बात कुछ और है |
जब शहरीयत ही नहीं, तो क्या ठहरूं |


कर नहीं सकते नुमाइसे दिल भरे बाजार में,
हर तरफ फानूस है...

कहकहों के दौर में, गुमसुम सा हूँ मैं, 

हर तरफ एक रौष है...
जो रंगीं है, रंगी रहे, मेरा क्या...
मेरी आवारगी की परवाह नहीं, तो क्या ठहरूं |


हर इक शाम, बैठ जाता हूँ बरार पर,
बोलता हूँ तन्हाई से, तू कहीं और जा…
कह देती है कि तेरे सा हमसफर नहीं…
दिल मे लिये तस्वीर, ढूँढता हूँ हर शक्ल मे वो शक्ल...
मेरी नाप का चेहरा ही नहीं, तो क्या ठहरूँ |

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