सोच रहा था बैठ के, अनहद कभी शहर और शाम मिलेंगे |
डूब गए थे जो तूफां में, वही फलक सरेआम मिलेंगे ||
टूटें डाली टूटें पत्ते, कभी तो मीठे आम मिलेंगे |
सोच रहा था बैठ के, अनहद कभी शहर और शाम मिलेंगे ||
हर जात और धर्म की बारात अब होने लगी है ||
वो खुद लंगड़ा है, पर दूसरे को गिरा कर चलता है |
वो किसी और की रोटी के चंद टुकडे़ खा कर चलता है ||
वो अऩ्दर से जलता है, वो ज़माने जलता है,
और मुस्कुरा कर चलता है……
अपने ज़ाम को रख़ बिस्तर पर किसी और का जा़म पियेंगे…
सोच रहा था बैठ के, अनहद कभी शहर और शाम मिलेंगे |
कभी तो सूरज बहकेगा, कभी तो पंछी चहकेंगे…
फिर महकेंगी मन्द हवाएं तेरे मेरे आँगन में…
फिर फूटेंगे कल कल झरने, भादौं, वैशाख और सावन में….
अपनी जिद को रख कोने में, कभी तो खासोआम मिलेंगे….
मन्दिर मस्जिद बैर भुलाकर, आरती और अज़ान मिलेंगे…
फिर से राधा नाचेगी और फिर वहीं घनश्याम मिलेंगे….
No comments:
Post a Comment