तेरी ग़मी में ज़र्रा ज़र्रा था...
तेरे जश्न में हंसने का हकदार नहीं...
परस्तिसी की हदें हुईं...
तेरे से बेईमान कितने हैं...
सरहदें खींच कर हंसता है वो बेशर्म सा...
कि ये तेरी जमीं और ये मेरी जमीं...
मुज़लिसी भी जा मिटी...
तेरे रहमान कितने है...
संगदिली की तो बात ही क्या...
तेरी आयतों में तो मेरा ज़िक्र कहाँ....
मुझे फक्र है कि मैं बेपरवाह हूँ जनाब...
ना जाने तेरे अरमान कितने हैं...
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