Nayi Kavita
Monday, June 6, 2022
Friday, June 4, 2021
Sunday, May 30, 2021
Saturday, April 25, 2020
Thursday, September 21, 2017
सोच
सोच रहा था बैठ के, अनहद कभी शहर और शाम मिलेंगे |
डूब गए थे जो तूफां में, वही फलक सरेआम मिलेंगे ||
टूटें डाली टूटें पत्ते, कभी तो मीठे आम मिलेंगे |
सोच रहा था बैठ के, अनहद कभी शहर और शाम मिलेंगे ||
हर जात और धर्म की बारात अब होने लगी है ||
वो खुद लंगड़ा है, पर दूसरे को गिरा कर चलता है |
वो किसी और की रोटी के चंद टुकडे़ खा कर चलता है ||
वो अऩ्दर से जलता है, वो ज़माने जलता है,
और मुस्कुरा कर चलता है……
अपने ज़ाम को रख़ बिस्तर पर किसी और का जा़म पियेंगे…
सोच रहा था बैठ के, अनहद कभी शहर और शाम मिलेंगे |
कभी तो सूरज बहकेगा, कभी तो पंछी चहकेंगे…
फिर महकेंगी मन्द हवाएं तेरे मेरे आँगन में…
फिर फूटेंगे कल कल झरने, भादौं, वैशाख और सावन में….
अपनी जिद को रख कोने में, कभी तो खासोआम मिलेंगे….
मन्दिर मस्जिद बैर भुलाकर, आरती और अज़ान मिलेंगे…
फिर से राधा नाचेगी और फिर वहीं घनश्याम मिलेंगे….
Saturday, June 3, 2017
तो क्या ठहरूं
शहर हसीं है, बात कुछ और है |
कर नहीं सकते नुमाइसे दिल भरे बाजार में,
कहकहों के दौर में, गुमसुम सा हूँ मैं,
हर तरफ एक रौष है...
जो रंगीं है, रंगी रहे, मेरा क्या...
मेरी आवारगी की परवाह नहीं, तो क्या ठहरूं |
हर इक शाम, बैठ जाता हूँ बरार पर,
बोलता हूँ तन्हाई से, तू कहीं और जा…
कह देती है कि तेरे सा हमसफर नहीं…
दिल मे लिये तस्वीर, ढूँढता हूँ हर शक्ल मे वो शक्ल...
मेरी नाप का चेहरा ही नहीं, तो क्या ठहरूँ |
Wednesday, May 25, 2016
Beparwah
तेरी ग़मी में ज़र्रा ज़र्रा था...
तेरे जश्न में हंसने का हकदार नहीं...
परस्तिसी की हदें हुईं...
तेरे से बेईमान कितने हैं...
सरहदें खींच कर हंसता है वो बेशर्म सा...
कि ये तेरी जमीं और ये मेरी जमीं...
मुज़लिसी भी जा मिटी...
तेरे रहमान कितने है...
संगदिली की तो बात ही क्या...
तेरी आयतों में तो मेरा ज़िक्र कहाँ....
मुझे फक्र है कि मैं बेपरवाह हूँ जनाब...
ना जाने तेरे अरमान कितने हैं...
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