Wednesday, May 25, 2016

Beparwah

तेरी ग़मी में ज़र्रा ज़र्रा था...
तेरे जश्न में हंसने का हकदार नहीं...
परस्तिसी की हदें हुईं...
तेरे से बेईमान कितने हैं...

सरहदें खींच कर हंसता है वो बेशर्म सा...
कि ये तेरी जमीं और ये मेरी जमीं...
मुज़लिसी भी जा मिटी...
तेरे रहमान कितने है...

संगदिली की तो बात ही क्या...
तेरी आयतों में तो मेरा ज़िक्र कहाँ.... 
मुझे फक्र है कि मैं बेपरवाह हूँ जनाब...
ना जाने तेरे अरमान कितने हैं...

Tuesday, January 12, 2016

Talkhi






दूर रहना मुमकिन नहीं 
पास आना मुनासिब नहीं 
ना जाने किस दरख्त ने सहेजा है मेरे जज्बातों को 
कि तेरे जिक्र से धड़कनें रुक सी जाती हैं | 
छुप सी गई हैं इस शहर की रंगीनीयत कहीं
बेरुखसार है ये आबो हवा | 
रुक जाता हूँ एक जोर की हंसी के बाद,
जे़हन में कहीं जब अक्श तेरा बनता है....
वो तल्खी अब इन अल्फाज़ों में नहीं,
मेरा परवाज कहीं और ही है....