Nayi Kavita
Tuesday, January 12, 2016
Talkhi
दूर रहना मुमकिन नहीं
पास आना मुनासिब नहीं
ना जाने किस दरख्त ने सहेजा है मेरे जज्बातों को
कि तेरे जिक्र से धड़कनें रुक सी जाती हैं |
छुप सी गई हैं इस शहर की रंगीनीयत कहीं
बेरुखसार है ये आबो हवा |
रुक जाता हूँ एक जोर की हंसी के बाद,
जे़हन में कहीं जब अक्श तेरा बनता है....
वो तल्खी अब इन अल्फाज़ों में नहीं,
मेरा परवाज कहीं और ही है....
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